Friday, January 28, 2011

Fwd: about the Drama incident in Bhopal



---------- Forwarded message ----------
From: supriya amber <supriya.amber@gmail.com>
Date: 2011/1/28
Subject: about the Drama incident in Bhopal
To: pvchr.india@gmail.com


PEER PARAAI Vibha Rani ka likha ek Natak hai jiske liye Ramayan ko adhar nahi banaya gaya hai balki Bihar ke maithil me gaijaane wali ek sohar par adharit hai jisme Ram ke janam par ek Hiran ke bacchhe ka maans paka kar bantaa jaata hai aur Hirni apne bacchhe ke bali chadhne ko lekar apni peeda ko Kaushalya se vyakt karti hai jiska bada hi marmik natya rupantaran kiya hai. baad me Hirni apne bacchhe ki khaal ko lene ke liye Kaushalya ke paas aati hai magar Kaushalya use bhi ye keh kar nahi deti hai ki apne chakravarti samrat ke liye choti si kurbani nahi kar sakti hai? tere jaison ke aulaadon ki aukat hi kya hai. aur us khaal ki khanjri banwa deti hai jisase Ram khelenge. Hirni Kaushalya ko kehti hai ki raani duusaron ki peeda ko samjho, tum bhi to maa ho. uske baad samay beetata hai aur Ram ko vanvas ho jaata hai tab Hirni aati hai aur raani se kehti hai ki aaj tum mera dukh samajh paaogi. saath hi is pure natak me jo mukhya sandesh diya gaya hai wo ye hai ki Raja ko hamesha praja ke liye tatpar rehna chahiye, usase taal baithana chahiye aur praja ke dukh aur zarorat ko apna kartavy ko samajhna chahiye. kulmila kar is natak se aaj ki janta ke prati netaaon/Sarkar ka dayitav chitrit kiya gaya hai jiski zarurat ab sarkaaren mehsoos nahi karti jiska pramaan Bharat Bhawan me hi mil gaya.

ye tha pure natak ka vivran Jo Ki Bhopal me Bharat Bhawan nyaas ke rangmandal ne mahila Nirdeshkon par adharit natakon ke liye Vivechana Rangmandal jabalpur ko Rashtriya Natya Samorah me Amantrit kiya tha. naatak shuru hue abhi 15 min hue the ki RSS Bajrang dal aur BJP ke lagbhag 30-35 log "Bharat mata ki jai, Ram ke naam par ye sab nahi chalega, ram ka apmaan nahin sahenge, Sanskriti ke saath khilwad bardasht nahi karenge"  ke nare lagate hue ghus aaye aur set ko tod for diya jisase music pit par baithey kai log baal baal bach gaye. uske baad lagataar unlogon ne naatak band karo ke naare lagaaye public ne oppose kiya ki - kya aaplog ab ye tay karenge ki hame kya dekhna hai? aur lagataar badi bahas hui magar vo log nahi jaa rahe the uske baad mai beech me pahunch gai aur kaafi sangharsh kiya mere husband jo ki Artist aur journalist hain aur us natak ke Art director bhi humdonon ne public ke saath milkar unhe bahar bhagaya. aap yakeen nahi karenge wo log kaafi sharaab pi kar pahunche the jinme se ek Rajesh Bhadauriya BJP ke Sanskritik Prakoshth ke sanyojak tha sabse zada badtmeezee kar raha tha. jab unlogo ko khadeda gaya naatak shuuru hua mushkil se 20 min aur hue the ki Bharat Bhawan ke bahar badi tadaad me sanskriti bachao manch jo ki BJP ka hi prakoshth hai saath hi Bajrang dal ke karyakarta nashe me chuur hokar police force ke saath pahunche aur Natak ko band karane ke liye Director par dabaaw banaya. bahut samjhane par bhi nahi mane aur ye kaha ki agar aap natak band nahi karoge to hum bheed ko andar jaane se rok nahin paayenge aur phir aapki zimmedari hogi jo kuch bhi hoga uske liye, ye police ke ala afssaron ne kaha. aur majbooran kisi bhi security ke abhav me aur shashan ke dabaaav me naatak ko band karna pada. jab se Bharat bhawan bana hai tab se ab tak ye pehli baar Antarang Sabhaagar me police pahunchi thi.

humlogo ne turant pure media ko iski jaankaari di aur lagbhag Bhopal me sabhi jagah iski coverage mili. ye puri ghatna 21/1/2011 friday ki hai.
is pure ghatna me sangharsh karte waqt meri god me mera beta Bigul bhi tha jo abhi 2 1/2  saal kaa hai usne is naatak me Raam ke bachpan ki bhumika ada ki hai wo sabkuch dekh raha tha mehsoos kar raha tha. jab humlog wahaan se bus se waapas laute to bus se utarte hi usne unsabhi team ke logon ko kaha " CHUPPI SABSA BADA KHATRA HAI ZUNDA AADMI KE LIYE, ISLIYE BOLO, ZINDABAAD ZINDABAAD INQLAAB ZINDABAAD."



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Dr. Lenin
Executive Director-PVCHR/JMN
Mobile:+91-9935599333
Hatred does not cease by hatred, but only by love; this is the eternal rule.
--The Buddha
 
"We are what we think. With our thoughts we make our world." - Buddha
 
 
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Thursday, January 27, 2011

मुसहर जीवन से एक साक्षात्‍कार

 

मुसहर जीवन से एक साक्षात्‍कार

डॉ लेनिन रघुवंशी

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद में बड़ागाँव ब्लॉक के मुसहर परिवारों की कहानी, समाज को उच्च शिखर पर पहुँचा रहा है, क्या आपको लगता है? आइये ज़रा महसूसने की कोशिश करें …

बड़ागाँव नाम से ही लगता है कि कितना विकसित होगा और कितना सुशोभित होगा यहाँ के नागरिकों का जीवन। मगर ये वास्तविकता से परे है। आज भी मुसहरों की स्थिति दयनीय है और उपेक्षाओं की मार से धरती पर कीड़े-मकोड़ों की तरह जीवन-जीने को मजबूर हैं। ऐसा लगता है कि जुल्मों-सितम को सहते हुए इसे नियति समझ बैठे हों। दिन की शुरुआत होती है, लेकिन यह पता नही रहता कि शाम तक बच्चों के लिए दो जुन की रोटी का जुगाड़ हो पायेगा कि नही।  उस स्थिति में बच्चों के लिए शिक्षा तो दूर एक वक्त का भोजन मिल जाए यही सौभाग्य मानते हैं। प्राथमिक विद्यालय व आँगनबाड़ी की स्थिति आज भी मनुवादी सोच को चरितार्थ कर रही है।

एक तरफ राज दावा कर रही है कि जल्द ही हमारे प्रदेश में गाँव-गाँव तक चिकित्सा वाहन की सुविधा हर एक दलित बस्ती में पहुँचेगी, मगर वास्तविकता क्या है? अस्पताल के बाहर गर्भवती महिला तड़पते हुए अपने बच्चों को खो दे रही है, पीड़ा को दूर किये बिना उसके साथ छूआछूत का बर्ताव किया जा रहा है। क्या उनका इस जाति में जन्म लेना दुर्भाग्य है कि वो मुसहर जाति में पैदा हुई है। अगर कभी-कभार ए0एन0एम0 (सरकारी स्वास्थ्य सेविका) डिलिवेरी करवा देती है तो उस महिला के साथ पशुओं से भी ज्यादा अभद्र व्यवहार होता है और महिनों की कमाई की जमा पूँजी उल्टे ऐंठ ली जाती है।

ग़रीबी व भूखमरी मानों सदियों से इनको दरिद्रतापूर्ण जीवन जीने के लिये बेबस कर दिया हो। उत्तर प्रदेश कुपोषण और भूखमरी के शिकार बच्चों की स्थिति में अव्वल है जिसमें मुसहर जाति के बच्चे ज्यादा पाये गये है।

यातना और संगठित हिंसा का शिकार यह जाति किसी भी समय उच्च जातियों और पुलिस द्वारा उत्पीड़ित होते है, इनके लिए न्याय पाना तो दूर ये गुहार भी नहीं कर सकते, ऐसी यहाँ सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था कायम है।

पुलिस द्वारा मुसहरों से घृणित कार्य करवाना मानों अब आदत सा बन गया है कि रात्रि-अर्द्धरात्रि, जब चाहे घर में घुसकर उठा लें और सड़ी गली लावारिश लाश फेंकवाना, थाने और जेल में आज भी शौचालय साफ करवाना व गंदी-गंदी वस्तुओं को जबरन उठावाना इत्यादि शामिल है।

उच्च जातियों द्वारा अपने यहां बेगारी करवाकर मजुदूरी न देना और समुदाय के महिलाओं के साथ छेड़छाड़ व असामाजिक दुर्व्‍यवहार आम बात है। अगर कभी इस समुदाय के लोग साफ़ कपड़े पहनकर रिश्‍तेदारी के लिये भी घर से निकलें और इन पर दबंग जातियों का नजर पड़ जाए तब जान-बूझकर जबरन काम करवाया जाता है ताकि इनके कपड़े मैले हो जाएं। लेकिन चुनाव की गर्माहट है तो मुसहर देवता, नहीं तो धोबी का कुत्ता बना रहता है। यही इनकी नियति है।

धर्म व जाति को प्रधानता देना लोगों द्वारा ढकोसला व मूर्खतापूर्ण असामन्जस्य फैलाने वाली समस्या अपने देश के लिए बतायी जा रही है। मगर वास्तव में ये एक व्यवसाय सा प्रतीत होता है जिससे कभी दबंगों, कभी पुलिवालों और कभी वकीलों का ही जेब भरता नजर आ रहा है।

हमारे देश में सदियों से चला आ रहा है कि स्त्री पूज्‍य है उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिये। कुछ समय पहले ही इस वक्तव्य को धूमिल होते देख हमारे संविधानदाता अनेक कानून व धारायें बनाकर चले गये। आज भी प्रत्येक शासनकाल में स्त्रियों की स्थिति में सुधार हेतु कुछ न कुछ योजनायें व आरक्षण की सुविधा महिलाओं को दी जा रही हैं। लेकिन क्या वो क्रियान्वित हो रहा है? या फिर केवल भाषणबाज़ी की संस्कृति बनकर रह  जा रहा है। इसको भी हम यहाँ इस विशालकाय गाँव में अवलोकित होते हुए देख सकते हैं। पुरुष-महिला को अपनी जागीर समझता हैं। पंचायतीराज को ही ले सकते हैं कि जिसमें महिला प्रधान होने पर भी सारे कर्ताधर्ता पुरुष ही रहते हैं। महिला को ये भी पता नहीं रहता कि उनका दायित्व क्या है और  हमारा निर्वाचन क्यों हुआ हैं। आखिर वो जाने कैसे? जब घर में चकला-बेलन ही चलाना है। जब कभी एकाध बार कोई ग़रीब व वंचित महिला बगावत कर घर के दहलीज़ को पार करती है, तो पुरुषरूपी घड़ियाल उसको अपने क़ब्जे़ में करने के लिए हर तरह के पैतरे अपनाता है। ये ज़रूरी नहीं कि उसका हथियार केवल पुरुषवादी सोच ही काफी है बल्कि वक्त पड़ने पर एक स्त्री के लिए स्त्री का इस्तेमाल कर लेते है। इस व्यवस्था में मुसहर महिलाओं की स्थिति सोची जा सकती हैं। खुले आम अनुसूचित जाति/अनुसूचित जाति अधिनियम व निवारण एक्ट की धज्जियॉ उड़ रही है। अस्पृष्यता उन्मूलन एक लम्बा संघर्ष है। जब हमारे ग्रामीण समाज की गंदी सोच ही दर्शन बन जाये तो हमारा संविधान व कानून मात्र केवल कागज की कठपुतली ही बनकर रह जायेगा। जिसे हम केवल अच्छे दर्शक की तरह देखेगें और एक गंभीर व प्रशंसनीय चित्रकथा की भाँति अपने मस्तिष्‍क के अवचेतन भाग के ऊपर छोड़ देगें। ऐसी स्थिति में इस समुदाय का क्या होगा?

अंततः हम यही कह सकते हैं कि ये केवल बड़ागाँव के मुसहरों की कहानी नहीं है बल्कि आज देश में यह जाति जहां भी है वहाँ ये कुरूतियाँ व्याप्त हैं। क्या अब भी हम यहीं कहेगें कि समाज सर्वोच्च शिखर पर पहुँच रहा है। उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बन गया है?

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर किए इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड, दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. लेनिन सरोकार के लिए मानवाधिकार रिपोर्टिंग करेंगे, ऐसा उन्‍होंने वायदा किया है. उनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है.

Wednesday, January 26, 2011

Fwd: ROHILAS IN INDIA & PAKISTAN 2010: REPORT 01



---------- Forwarded message ----------
From: ACHA-Pritam Rohila <asiapeace@comcast.net>
Date: Sun, Jan 16, 2011 at 10:21 PM
Subject: ROHILAS IN INDIA & PAKISTAN 2010: REPORT 01
To:


January 16, 2011

ROHILAS IN INDIA & PAKISTAN 2010: REPORT 01

For a few related pictures, please see the attached Power-point Presentation

About 32 hours after leaving home in Oregon, Kundan and I reached Mumbai, at 3:00 a.m. on January 8. With the OCI cards in our hands, we had no trouble at the Immigration Desk. And smiling faces our cousin, Kuldip Mehta, and his wife, Shilpa, at the receiving area of the Arrival Hall, immediately relieved us of our travel stress.

After enjoying the typical Mehta family hospitality, and some sorely needed rest, next morning, we woke up at 2:45 a.m. to start our air travel to Varnasi, U.P., the site of our first Youth Peace Camp, being co-sponsored by our sister organization, People's Vigilance Committee for Human Rights (PVCHR).

The thick blanket of frosty fog that covered most of north India, had made life miserable for many people, and had been disrupting the air as well as land traffic, for the last many days.

At Mumbai airport, we used our rescheduled Kingfisher flight to Delhi at 7:15 a.m. Upon our arrival there, an hour later, we found the zoo-like atmosphere at Delhi Airport. Unable to land at their north Indian destinations, several flights had returned to Delhi. Frustrated, tired and sleepy passengers were clamoring for attention of the airline staff for seats on other flights.

Since the connecting Kingfisher flight to Varanasi had already been cancelled, we were accommodated on the 11:30 a.m. Jet Airways flight. Quick and hot vegetarian meals served on both flights were tasty and filling.

More than two hours later than the originally scheduled time, we arrived at the recently renovated Varanasi Airport at 1:00 p.m. The PVCHR representative, who welcomed us there, took us straight to the Hotel Surya, the former residence of a local king.

The first order of business was the ceremony at 4:00 p.m., at a local hotel, for Dr. Mohammad Arif, one of the six ACHA Peace Star 2010 recipients. Inspired by the Gandhian philosophy, Dr. Arif abandoned his teaching career to promote communal harmony, composite culture, secularism and democratic values. In this pursuit he has built alliances of Dalits, Tribals and minority groups; organized awareness sessions for the media, and seminars, lectures, conventions, training workshops for peace and harmony workers, and street-plays for the general public; developed training modules; published awareness and training materials; established a library of resource materials to facilitate research on and documentation of sectarian clashes; and has founded the Centre for Harmony & Peace. Some of his initiatives have helped abort severe conflicts in such communally sensitive areas as Varanasi and have aided capacity building in other areas.

 

ACHA President, Dr. Lenin Raghuvanshi, presented the award. About 50 individuals representing various sections of the local civil society attended the ceremony. It was covered well by some regional and national newspapers and TV channels. 

Next morning we started our two-day Youth Peace Camp, at a hotel in Jagatganj, Varanasi. The camp was conducted with the assistance of PVCHR staffers, Katyayini Singh and Rajendra Prasad. Thirty young men and women, ranging in age 17 to 25, and in education from 9th grade to M.A. (Prev), from Varanasi, and neighboring villages participated in the camp. Katyayini Singh and Rajendra Prasad were awarded Certificates of Leadership Training –Basic Level. The arrangements by the PVCHR for the camp, made it a very gratifying experience for us.

Since trains were running late by as long as 27 hours, our local co-sponsor, the National Alliance of People's Movements urged us to cancel our next peace camp at Baitul in Madhya Pradesh, scheduled to be held on January 14 and 15. With difficulty, the PVCHR staff helped us to get booking on the January 12 Jet Airways flights from Varanasi to Delhi and from Delhi to Ahmedabad, in Gujarat.

We spent the January 12 night at a friend's home in Ahmedabad. Next day we left by private car to Anand via Gandhinagar. Since our arrival here we are enjoying the gracious hospitality of our Doshi extended family.

The atmosphere all over the state of Gujarat is dominated by Uttrayan, the three-day Spring festival. Kite-flying and partying are the main features of the festival.  Armed with dozens of kites, and glass-laced string, people, young and old, climb up on their roof-tops and terraces to engage in kites-duels with their neighbors. The aim is to cut the string of the opposing party making them lose their kite. The neighborhood children run around streets chasing and gathering the kites thus lost. Sometimes these duels lead to fights and shouting matches.

Accidents are not uncommon. According to a news report nine individuals have lost their lives and about a hundred have been injured in the last two-days of kite flying in Gujarat. Also, about 700 birds have suffered injuries. Kite accidents frequently cause electricity outages, making work and life difficult for many.

Punctuated by noisy blasts of firecrackers, the cacophony of religious and popular music played loudly at various gatherings in the neighborhood has overloaded our senses, and made conversation arduous. A bout of diarrhea and vomiting that I suffered yesterday did briefly elevate my personal stress level as well. But, surrounded as we are by some Doshi angels, no stress has been too bothersome, nor any problem too difficult. 

Best wishes,

Pritam



Pritam K. Rohila, Ph.D.

Executive Director

Association for Communal Harmony in Asia (ACHA)

www.asiapeace.org & www.indiapakistanpeace.org

asiapeace@comcast.net



Thursday, January 20, 2011

दलितों की मदद के लिए भारतीय को जर्मन पुरस्कार

nri

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दलितों की मदद के लिए भारतीय को जर्मन पुरस्कार
Saturday, 11 Dec 2010 9:21:54 hrs IST

Dr. Lenin Raghuvanshi

वीमर (जर्मनी)। दलितों के हक के लिए लम्बी लड़ाई लड़ने वाले एक भारतीय मानवाधिकार कार्यकर्ता लेनिन रघुवंशी को यहां जर्मनी के वीमर शहर में एक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। रघुवंशी उत्तर प्रदेश की 'पीपल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स' (पीवीसीएचआर) के संस्थापक हैं। वह महिलाओं, बच्चों और स्वदेशियों के अधिकारों के लिए भी काम करते हैं और अन्याय के शिकार लोगों को मदद के लिए सलाह देते हैं।


रघुवंशी को जून में ही पूर्वी देशों के वार्षिक मानवाधिकार पुरस्कार के विजेता के रूप में चुन लिया गया था। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस पर जर्मनी आमंत्रित किया गया। यहां उन्हें पुरस्कार के रूप में 3,300 डॉलर की राशि दी गई। उन्हें दिए गए प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि 40 वर्षीय चिकित्सक रघुवंशी भूख से मरने वाले और पुलिस प्रताड़ना के शिकार बनते रहे दलितों या भारत की सबसे निम्न जाति के सदस्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

http://www.rajasthanpatrika.com/news/nri/12112010/Dr.-Lenin-Raghuvanshi/90432

Friday, January 07, 2011